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दिल्ली की एक शिक्षिका के अपमान करने पर रोष प्रगट करते एक कवि की कविता "कुंठित जन - प्रतिनिधि"

कुंठित जन - प्रतिनिधि
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है एक गवैया जन -प्रतिनिधि जो
रहता      कुंठित     ऐंठा  -  ऐंठा ,
गली - गली    जो     गाता     था 
अपनी     औकात   भुला   बैठा ।

सत्ता   के  मद  में  चूर   हुआ  वो
जन- गण - मन   को   क्या  जाने ,
भूला     शिष्ट      आचरण     को
मर्यादा           कैसे        पहचाने ।

जो  इधर - उधर नाचा करता  था
सम्मान   भला   वो   क्या   जाने ,
जिसका    खून      हुआ     पानी
वो   शिष्टाचार    को   क्या  जाने ।

वह , शिक्षक को आँख दिखाता है
जिसने   उसको  भी   ज्ञान  दिया ,
संस्कार       सब      भूल      गया
मातृशक्ति    का   अपमान   किया ।

शिक्षक  समाज  है  स्वार्थ - रहित
उनको   जो     मान    नहीं    देगा ,
"भावुक"    कहते   उस   नेता को
सत्ताच्युत   जन - मन  कर   देगा ।

अवधेश  तिवारी "भावुक"
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